Sunday, June 29, 2008

भाग्य से ज्यादा कर्म को स्थान

जी हाँ, ईश्वर एक शक्ति है जो सारे जगत को चलाता है तथा सारे जगत उन्हीं की लीला है। हमें ईश्वर पर श्रद्धा ,विश्वाश रखना चाहिए।
मैं ईश्वर पर विश्वास करता हूँ। पर मैं ईश्वर की पूजा के लिए बह्याडम्बर को नहीं मानता हूँ। बल्कि सच्चे ह्रदय से ईश्वर में विश्वास को मानता हूँ।
किसी भी कार्य में मैं भाग्य से ज्यादा कर्म को स्थान देता हूँ। कितने लोग किसी भी कार्य में ख़ुद कर्म करते नहीं व सिर्फ उसको भाग्य पर छोड़ देते हैं और कार्य सफल न होने पर भाग्य को कोसते हैं यह उचित नहीं है। याद रखनी चाहिए कि जो मेरे भाग्य में है, यदि मैं कर्म न करूँ तो वह भी मुझे नहीं मिलेगा।
यदि मेरा कोई कार्य सफल नहीं हुआ तो हमें ईश्वर या भाग्य को नहीं कोसना चाहिए बल्कि हमें वह कारण जानने की कोशिश करनी चाहिए कि किस कारण से हम सफल नहीं हो सके।
-- महेश

Saturday, March 15, 2008

सत्य

सत्य का मतलब इतना ही नहीं कि रोज के व्यव्हार में असत्य न बोलना या असत्य आचरण नहीं करना। लेकिन सत्य ही परमेश्वर है और इसके सिवा दूसरा कुछ नहीं। इस सत्य की खोज और पूजा के लिए ही दूसरे सब नियमों की जरुरत रहती है और उसी में से वे पैदा होते हैं। ये सत्य के पुजारी अपने माने हुए देशहित के लिए भी कभी असत्य न बोलें या उसका आचरण न करें। सत्य के लिए वे प्रहलाद की तरह अपने माता-पिता और बुजुर्गों की आज्ञा भी विनयपूर्वक भंग करने में अपना धर्मं समझें।
--- महत्मा गाँधी

Monday, March 10, 2008

सभा में सब मृतक समान

जिस सभा में अधर्म से धर्म, असत्य से सत्य, सब सभासदों के देखते हुए मारा जाता है उस सभा में सब मृतक के समान हैं। जानो उनमें कोई भी नहीं जीता।

- स्वामी दयानंद सरस्वती

Sunday, March 9, 2008

लोकनिंदा

लोकनिंदा से डरना चाहिए क्योंकि यह डर मनुष्य को बुरे कर्मों से बचाता है। हाँ, यदि लोकनिंदा कर्तव्य के मार्ग में बाधा जाए तो इससे डरना कायरता है।

संतवाणी

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अपने काम से काम कहने से काम नहीं चलेगा

हमें अपने काम से काम, अपने मतलब से मतलब कहने मात्र से काम नहीं चल सकता। ऐसा करने से बुरों का विरोध न हो सकेगा और वे मनमानी करके अपनी दुष्टता बढाते हुए दूसरे लोगों के लिए दिन-दिन अधिक भयंकर होते चलेंगे। उसी प्रकार सज्जनों के कार्यों में प्रोत्साहन या सहयोग न दिया जाय तो वे भी निराश होकर चुप बैठे रहेंगे और उनके कार्यों से अनेकों को जो लाभ हो सकते थे वे न हो सकेंगे।

पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

Monday, February 18, 2008

सेवा की सच्ची आराधना

  • सुनने का अभ्यास पैदा करो। सुनने से पाप-पुण्य की, धर्म-अधर्म की तथा सत्य-असत्य की जानकारी होती है। मनुष्य को जीने की कला आती है। एक-दूसरे के प्रति मन में बैठी भ्रांतियों का निवारण होता है। अतः सुनो।
  • सुने हुए को याद रखने की आदत डालो। एक कान से सुनकर दूसरे से मत निकालो। जिस प्रकार कुएँ के जल में भरी हुई छलनी कुएँ से ऊपर आने तक खाली हो जाती है, ऐसे ही सुने हुए जीवन तथ्यों को भूल जाने का भूल मत करो। यदि सत्संग या विद्या मन्दिर में सुना हुआ पाठ स्मरण नहीं रखोगे, तो जीवन भर कभी उन्नति व प्रगति नहीं कर सकोगे।
  • नए दोषों से सदा बचते रहो। भ्रष्टाचार एवं पापाचार एक भयंकर दलदल है। इस दलदल से सदा दूर रहो। बुराई से बचकर रहनेवाला बुराई के फल से सदा अछूता रहता है। वह सदा निर्भयता के साथ जाता है।
  • सदा इस बात को याद रखो - यदि हम किसी की सहायता करेंगे तो समय आने पर हमारी सहायता करनेवाला भी कोई अवश्य पैदा हो जाएगा। यदि आज हमारी कोई सहायता नहीं कर रहा है तो इसका अर्थ स्पष्ट है कि हमने भी कभी किसी की सहायता नहीं की। सेवा ग्लानी रहित होकर करनी चाहिए। यदि सेवक रोगी व्यक्ति से घृणा करता है, तो धर्मराज के दरबार में उसकी सेवा स्वीकार नहीं की जाती। नर-सेवा को नारायण-सेवा समझाना ही सेवा की सच्ची आराधना है।

-- भगवान् महावीर